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गजल --सनतकुमार सुक्यो बाग, माटो मलिलो रहेन झर्यो फूल, माली गतिलो रहेन
विपद्मा पनि आज कोही रुँदैन सुक्यो आँसु, आँखा रसिलो रहेन
झुकेका नजर के उठाएर हेरूँ ? धूलो फैलियो, व्योम नीलो रहेन
बुन्यौ आज सम्बन्धको सूत्र कस्तो ! अँगालो कसैको कसिलो रहेन
सँधै चल्छ संवाद, के चल्छ-चल्छ ! कुरो बुझ्नु कहिल्यै सजिलो रहेन।
अनामनगर, काठमाडौँ। (मधुपर्कबाट साभार)
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