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दुश्मन

--मनु मन्जिल

 

मेरा एक दुश्मन है

जो मुझे इस कदर घृणा करता है जैसे मैं गंदगी का ढेर हूं

पर मैं उसे इस कदर प्यार करता हूं जैसे वह फूल हो।

 

वह नहीं चाहता

मेरे चेहरे पर सूर्योदय हो

मेरे बागीचे में वसन्त आए

मेरे घर के खिड़की-दरवाजों से हवा अन्दर ढुके

मेरे अंगना में फूल महके

 

वह नहीं चाहता

मेरे बच्चों की चिल्ल-पों उसे सुनाई दे

उनकी खुशहाली उसे आहत करे

वह अपने बरामदे में बैठकर चाहता है

दूर.........दूर......... चलता हुआ जो कोई भी मेरे घर में न ढुके

उपहार और तोहफे लेकर मेरे घर की तरफ कोई भी नजर न लगाए

मन्दिर से आशीर्वाद लेकर आते बुजुर्ग मेरे घर के सामनेवाला विश्रामागार में न बैठे

 

मेरे घर में चिड़ियों का बैठना उसे पसन्द नहीं

चाँद मेरे छत को नहाए

मेरे खेत खलिहानों में सौभाग्य झूले

आम के पेड़ों में आशा के फूल खिलें

नाले का पानी मेरे खेत को भिगोए

उसे कुछ पसन्द नहीं

यह बरसात क्यों मेरा छत नहीं तोड़ती ?

दूसरे गांव की नदी क्यों मेरे घर के रास्ते नहीं बहती ?

आग क्यों चुल्हे में चुपचाप है ?

क्यों चिंगारी जुगनू की भाँति ऊपर नहीं उड़ती ?

क्यों कुछ नहीं जलाती ? 

 

वह चाहता है मेरे सपनें मरूस्थल की तरह उजड़ जाएं

मेरे घर में तूफान बस जाए

रात में चोर मेरे भंडार में ढुक जाए

मेरे होंठों से

तबस्सुम निकलके रेत में मिल जाए

पर मैं उसे इस कदर प्यार करता हूं जैसे वह फूल हो।

 

इस भरी दुनियां में दूसरा कोई

बन्धु-बान्धव, अपना-पराया, बड़ा-छोटा, परिचित-अपरिचित

एक भी कहीं नहीं है

जो अपनी आकांक्षाएं, अपने सपने भूलकर

धूप-बरसात, फूल, चांद और चिड़ियों को भूलकर

घर, धरती और आकाश को भूलकर

मेरे बारे में इतनी गहराई से सोचे

मुझे इतना तवज्जुह दे

 

सच है

दुश्मन का न होना तो

हरदम अपनी तरफ नजर देनेवाला जीवन का एक पलड़ा न होने जैसा है।

मैं उसे इस कदर प्यार करता हूं जैसे वह फूल हो।

 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी